शहर में लगातार बढ़ रही चाकूबाजी, हिंसा और हत्या की घटनाओं ने आमजन के मन में गहरी चिंता पैदा कर दी है।

आज लोग घर से निकलते समय सुरक्षा को लेकर आशंकित रहते हैं। आजाद चौक से लेकर मंगलनगर तक हुई वारदातें यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं और कानून का भय कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है।
पुलिस की सक्रियता अपराध होने के बाद जरूर दिखाई देती है। आरोपी पकड़े जाते हैं, कानूनी कार्रवाई होती है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि अपराध होने से पहले उसे रोकने की व्यवस्था कितनी मजबूत है। कानून-व्यवस्था की वास्तविक सफलता अपराधियों को पकड़ने में नहीं, बल्कि अपराध को होने से रोकने में निहित होती है। अलग-अलग घटनाओं में कार्रवाई के भिन्न तौर-तरीके भी जनता के मन में सवाल खड़े करते हैं। निष्पक्षता और समानता ही कानून की विश्वसनीयता की असली पहचान है।
एक समय मोहल्ला समितियां पुलिस के लिए मजबूत सूचना तंत्र का काम करती थीं। स्थानीय नागरिकों से नियमित संवाद के कारण संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी समय रहते मिल जाती थी। इससे कई अपराध प्रारंभिक स्तर पर ही रोके जा सकते थे। आज संसाधन, तकनीक और निगरानी के आधुनिक साधन पहले से अधिक हैं, फिर भी जमीनी स्तर पर संवाद की कमी महसूस होती है। यह अंतर भरना जरूरी है।
अवैध हथियारों की बढ़ती उपलब्धता भी गंभीर चिंता का विषय है। चाकू, कट्टे और अन्य हथियार अपराधियों तक आसानी से पहुंच रहे हैं। केवल हथियार जब्त करना पर्याप्त नहीं है; उन लोगों तक पहुंचना भी जरूरी है जो इनका अवैध कारोबार चला रहे हैं। जब तक सप्लाई नेटवर्क नहीं टूटेगा, तब तक अपराधियों के हाथों में हथियार पहुंचते रहेंगे।
लेकिन यदि अपराध की जड़ तक पहुंचें, तो सबसे बड़ा कारण नशे का बढ़ता दायरा है। शहर और आसपास के क्षेत्रों में नशे का जाल तेजी से फैल रहा है। स्मैक और अन्य नशीले पदार्थों की लत युवाओं को अपराध की अंधेरी दुनिया की ओर धकेल रही है। अमकुही की पहाड़ियों में युवक युवतियों द्वारा खुलेआम नशा किया जाना बताता है कि समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है। नशा व्यक्ति का विवेक छीन लेता है, और छोटी-सी बहस भी हिंसक रूप ले सकती है।
चोरी, लूट, चाकूबाजी और हत्या जैसी अधिकांश वारदातों के पीछे कहीं न कहीं नशे की भूमिका दिखाई देती है। इसलिए यदि अपराध पर वास्तविक नियंत्रण चाहिए, तो नशे के कारोबार पर निर्णायक प्रहार करना होगा। साथ ही अवैध हथियारों की सप्लाई रोकने और पुलिस-जन संवाद मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।
समय की मांग है कि केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करने की मानसिकता बदली जाए। वरिष्ठ अधिकारियों को जमीनी हालात का गंभीर आकलन कर ऐसी रणनीति बनानी होगी, जिससे अपराध जन्म लेने से पहले ही रोका जा सके। जब तक नशे की जड़ पर चोट नहीं होगी, तब तक अपराध पर स्थायी लगाम लगाना मुश्किल ही रहेगा।

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