अब रिश्वतखोर ही नहीं, उनके मददगार भी आएंगे शिकंजे में

लोकायुक्त की नई रणनीति से भ्रष्टाचार के पूरे नेटवर्क पर कार्रवाई की तैयारी
भोपाल। मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई अब नए चरण में प्रवेश करती दिख रही है। अब केवल रिश्वत लेने वाले सरकारी अधिकारी-कर्मचारी ही नहीं, बल्कि उनके लिए सौदे तय कराने वाले, रकम वसूलने वाले और पूरे नेटवर्क को संचालित करने वाले सहयोगी भी कानून के दायरे में लाए जाएंगे। लोकायुक्त की इस नई कार्यशैली ने प्रशासनिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है।
लोकायुक्त का मानना है कि कई मामलों में सरकारी कर्मचारी सीधे रिश्वत नहीं लेते, बल्कि अपने रिश्तेदारों, परिचितों या एजेंटों के जरिए लेन-देन कराते हैं। ऐसे में केवल मुख्य आरोपी पर कार्रवाई करने से भ्रष्टाचार की जड़ तक पहुंचना संभव नहीं हो पाता। नई रणनीति के तहत अब उन सभी लोगों की भूमिका की भी गहन जांच होगी जो इस अवैध व्यवस्था को मजबूत करते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश भ्रष्टाचार मामलों में एक संगठित नेटवर्क काम करता है, जिसमें बिचौलिये, रिश्तेदार और सहयोगी शामिल रहते हैं। यही लोग पैसे का लेन-देन सुरक्षित तरीके से कराते हैं ताकि अधिकारी सीधे पकड़े न जाएं। यदि इन कड़ियों पर भी कानूनी शिकंजा कसा गया तो रिश्वतखोरी का पूरा तंत्र कमजोर पड़ सकता है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता के तहत आपराधिक साजिश, सहयोग और अवैध लाभ से जुड़े प्रावधान भी ऐसे मामलों में लागू किए जा सकते हैं। इससे जांच एजेंसियों को व्यापक कार्रवाई का अधिकार मिलेगा।
लोकायुक्त की इस पहल के बाद प्रदेश के पुराने मामलों की भी दोबारा समीक्षा संभव मानी जा रही है। जहां-जहां जांच में किसी रिश्तेदार या सहयोगी की सक्रिय भूमिका सामने आएगी, वहां सह-आरोपी बनाकर कार्रवाई की जा सकती है।
इस सख्त रुख को भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी पहल माना जा रहा है। संदेश साफ है—अब रिश्वत लेने के लिए किसी और का सहारा लेना भी सुरक्षित नहीं रहेगा।

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