यह जनसुनवाई है या जन-रुलाई? जिले की बरही तहसील से कलेक्टर के समक्ष पहुंचा यह वाकया हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के मुंह पर वो जोरदार तमाचा है,

जिसकी गूंज भोपाल में बैठे आकाओं तक पहुंचनी चाहिए। एक नेत्रहीन, लाचार और बुजुर्ग इंसान अपनी ही जमीन को दबंगों के चंगुल से छुड़ाने के लिए एक साल तक दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर अपनी चप्पलें घिस देता है, लेकिन हमारे ‘साहबों’ की चमड़ी इतनी मोटी हो चुकी है कि उन्हें उस बूढ़ी चीख का एक कतरा तक सुनाई नहीं दिया।
शर्म आनी चाहिए उस राजस्व अमले को, जो सरकार से मोटी तनख्वाहें सिर्फ इसलिए लेता है ताकि फाइलों को दबाकर बैठ सके और दबंगों को खुली छूट दे सके। एक साल! पूरे 365 दिन तक पटवारी, आरआई और तहसीलदार आखिर क्या कर रहे थे? क्या ये कुंभकर्णी नींद में सोए थे या फिर दबंगों की सरपरस्ती में अपनी जेबें गर्म करने में मसरूफ थे? जब आंखें बंद रखने का इनाम मिलने लगे, तो तंत्र ऐसे ही पंगु और बहरा हो जाता है।

हम सीधे शब्दों में प्रशासन से ये तीखे सवाल पूछते हैं:
* दबंगों के आगे इतना सरेंडर क्यों? एक लाचार नेत्रहीन की जमीन पर कब्जा हो जाता है और पूरा प्रशासनिक अमला तमाशा देखता रहता है। क्या कटनी प्रशासन पर कानून का राज नहीं, बल्कि भू-माफियाओं और दबंगों का खौफ चलता है?

* सिर्फ दिखावे की नौटंकी है जनसुनवाई? अगर हर मंगलवार को लगने वाली जनसुनवाई इतनी ही पाक-साफ और असरदार है, तो एक बुजुर्ग को न्याय की जगह मौत की भीख मांगने के लिए कलेक्टर के सामने गिड़गिड़ाना क्यों पड़ा? क्या यह व्यवस्था सिर्फ फोटो खिंचवाने और कागजी कोरम पूरा करने के लिए है?

* दोषी अधिकारियों पर एफआईआर क्यों नहीं? इस बुजुर्ग को आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर करने वाले बरही तहसील के उन लापरवाह और संवेदनहीन अफसरों पर अब तक आपराधिक मुकदमा दर्ज क्यों नहीं किया गया?
यह मामला सिर्फ एक मंगल पटेल की जमीन का नहीं है। यह इस बात का सबूत है कि जमीनी स्तर पर हमारा सिस्टम कितना सड़ चुका है, जहां आम आदमी के जीने का हक और उसकी अस्मत कौड़ियों के भाव नीलाम हो रही है। कलेक्टर साहब, इस बुजुर्ग को सांत्वना के दो मीठे बोल और जांच का खोखला भरोसा मत दीजिए। अगर वाकई कुर्सी की मर्यादा बची है, तो 24 घंटे के भीतर उस जमीन से कब्जा हटवाइए और उन निकम्मे पटवारी-आईआई को सस्पेंड कर सलाखों के पीछे भेजिए जिन्होंने इस बुजुर्ग को जीते जी मारने पर मजबूर किया। वरना, इस ‘अंधे सिस्टम’ की अर्थी उठने में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है!

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