राजस्व मामलों के जानकारों का कहना है कि यह केवल नामांतरण निरस्त करने तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे-सीधे शासकीय संपत्ति को खुर्द-बुर्द करने और जालसाजी का गंभीर आपराधिक कृत्य है। जिला प्रशासन को इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए तुरंत एफआईआर (FIR) दर्ज करानी चाहिए।
इन पर कानूनी शिकंजा कसना जरूरी:
* तत्कालीन पटवारी: जिसने साल 2024 में दूसरे आदेश की आड़ लेकर शासकीय रिकॉर्ड (खसरा नंबर 143 और 164) में जानबूझकर हेरफेर की। पद का दुरुपयोग कर सरकारी जमीन निजी संस्था के नाम करने के लिए पटवारी पर जालसाजी और भ्रष्टाचार का मुकदमा चलना चाहिए।
* SRM संस्था के तत्कालीन पदाधिकारी व मुख्तियार: संस्था के तत्कालीन प्रबंधकों और सिहोरा निवासी मुख्तियार सुरेंद्र तिवारी ने बिना कलेक्टर की अनुमति के गरीबों के पट्टे और चरनोई की जमीन की फर्जी रजिस्ट्री दिखाई। साथ ही, गरीब डुमार परिवार के हक को मारकर धोखाधड़ी की।
क्या केवल जमीन वापसी काफी है?
बड़ा सवाल यह है कि यदि कोई आम नागरिक सरकारी जमीन पर कब्जा करता है तो प्रशासन तुरंत बुलडोजर और एफआईआर की कार्रवाई करता है। फिर इतने बड़े भू-माफिया खेल और रिकॉर्ड की हेराफेरी के उजागर होने के बाद भी दोषी सरकारी कर्मचारी और रसूखदार संस्था के पदाधिकारियों पर एफआईआर दर्ज करने में देरी क्यों की जा रही है? जिला कलेक्टर को इस मामले में एफआईआर के निर्देश देकर एक कड़ा संदेश देना चाहिए ताकि भविष्य में कोई सरकारी रिकॉर्ड से छेड़छाड़ करने की हिम्मत न कर सके।

- स्व. श्री विनोद कुमार बहरे
