कहते हैं गुटखा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है, लेकिन इन दिनों तंबाकू जगत के दो बड़े ‘शंहशाह’ कटनी सहित आस पास के शहरों की अर्थव्यवस्था की सेहत बिगाड़ने में जुटे हैं। बाजार के गलियारों में सुगबुगाहट है कि नगद नारायण ‘कैश’ की महिमा और अलग ही ‘सरनेम’ से मशहूर पटेल साहब की साख पर चलने वाले दिग्गज ब्रांड ने नया आर्थिक मॉडल खोज लिया है। इस मॉडल का नाम है—”तुम मुझे नगदी दो, मैं तुम्हें बिना बिल का स्वाद दूंगा!”
जी हां, इन दोनों कंपनियों ने डिजिटल इंडिया और ‘कड़क’ टैक्स नियमों के इस दौर में अपनी एक अलग ही ‘कैश-कॉनामी’ बसा ली है।
‘जादूई’ गणित: एक गाड़ी कागजी, दस गाड़ी ‘गायब’
बाजार में इन दिनों इन दोनों कंपनियों की गाड़ियों का आना-जाना किसी हॉलीवुड की ‘मिस्टर इंडिया’ फिल्म जैसा हो गया है। डिस्ट्रीब्यूटरों के यहां माल उतरने का जो गणित सामने आ रहा है, वह बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों को चक्कर में डाल सकता है:
* चमत्कारी बिलिंग: टैक्स विभाग की आंख में धूल झोंकने के लिए बड़ी शालीनता के साथ एक गाड़ी का पक्का बिल थमाया जाता है।
* अदृश्य गाड़ियां: इसके बाद, उसी एक बिल की ‘पवित्र रोशनी’ में पीछे-पीछे 10 गाड़ियां बिना किसी बिल, बिना किसी टैक्स और बिना किसी शोर-शराबे के सीधे गोदामों में समा जाती हैं। इन्हें देखने के लिए विशेष ‘कैश-लेंस’ की जरूरत होती है।
रिटेलर का दर्द: “बिल मांगोगे तो चूना भी नहीं मिलेगा”
इस पूरे खेल में सबसे मजेदार स्थिति छोटे दुकानदारों (रिटेलर्स) की है। डिजिटल पेमेंट के जमाने में भी इन ब्रांड्स का माल खरीदने के लिए उन्हें अपनी जेबें हरे और मटमैले नोटों से भरकर रखनी पड़ती हैं।
यदि कोई मासूम रिटेलर गलती से पूछ ले—”साहब, माल का बिल मिलेगा क्या?”
तो आगे से जवाब आता है —”बिल चाहिए तो आगे बढ़ो, गुटखा चाहिए तो कैश लाओ। बिल मांगोगे तो अगली बार से चूना लगाने लायक भी नहीं छोड़ेंगे!”
नतीजा यह है कि रिटेलर चुपचाप बिना बिल का माल लेता है और आगे ग्राहकों के गाल लाल करने में जुट जाता है।
जीएसटी विभाग को ‘स्लो प्वॉइजन’
सरकार चिल्ला-चिल्ला कर थक गई कि “कैशलेस बनो, ऑनलाइन आओ,” लेकिन इन गुटखा सूरमाओं ने ठान लिया है कि वे देश को ‘टैक्स-लेस’ बनाकर ही दम लेंगे। जब 90% धंधा सिर्फ और सिर्फ हाथ से हाथ में जाने वाले नोटों पर चल रहा हो, तो सरकारी खजाने को तो ‘स्लो प्वॉइजन’ मिलना तय है।
अब देखना यह है कि सरकारी जांच एजेंसियां और जीएसटी के सूरमा इन कंपनियों के इस ‘बिना बिल वाले धुएं’ को कब तक सूंघ पाते हैं, या फिर हमेशा की तरह कंपनियां टैक्स का चूना लगाकर सरकारी फाइलों पर भी कत्था मलकर आगे निकल जाएंगी!

- स्व. श्री विनोद कुमार बहरे
