महर्षि महेश योगी की संस्था की आड़ में खेल: कटनी में करोड़ों की सरकारी ज़मीन पर कब्जा और बना लिया था पट्टा, अपर कलेक्टर कोर्ट ने नामांतरण किया निरस्त, खुली वर्तमान प्रबंधन की पोल

महर्षि महेश योगी की संस्था की आड़ में खेल: कटनी में करोड़ों की सरकारी ज़मीन पर कब्जा और बना लिया था पट्टा, अपर कलेक्टर कोर्ट ने नामांतरण किया निरस्त, खुली वर्तमान प्रबंधन की पोल

जिस संस्था को महर्षि जी ने वैश्विक साख दी, उसके वर्तमान कर्ता-धर्ताओं ने ढीमरखेड़ा में फंसाया विवादों में; अपर कलेक्टर कोर्ट ने जमीन वापस सरकार के नाम दर्ज करने के दिए आदेश।

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कटनी ।
दुनियाभर में भारतीय संस्कृति, योग और ध्यान का संदेश फैलाने वाले परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा स्थापित संस्था ‘स्प्रिचुअल रीजनरेशन मूवमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ (SRM Foundation) के वर्तमान प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ढीमरखेड़ा तहसील के ग्राम बम्हौरी में बिना किसी सक्षम सरकारी आदेश और बिना जिला कलेक्टर की अनुमति के, करोड़ों रुपये मूल्य की 11 एकड़ (4.49 हेक्टेयर) सरकारी जमीन को संस्था के नाम दर्ज कराने का एक बड़ा मामला सामने आया है।
अपर कलेक्टर न्यायालय कटनी ने इस मामले में कड़ा कानूनी रुख अपनाते हुए संस्था के नाम किया गया पूरा नामांतरण निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने इस बेशकीमती जमीन को दोबारा मध्य प्रदेश शासन के खाते में दर्ज करने का आदेश जारी किया है। इस फैसले के बाद क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार गर्म है कि महर्षि जी के नाम पर बनी संस्था के वर्तमान नुमाइंदे अंदरखाने किस तरह के नियमों को ताक पर रखकर काम कर रहे हैं।

महर्षि महेश योगी जी की छवि पर लग रहा है दाग
स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों और जानकारों का कहना है कि यह पूरा मामला महर्षि महेश योगी जी जैसे महान संत की वैश्विक छवि को धूमिल करने जैसा है। महर्षि जी ने इस संस्था की नींव समाज के आध्यात्मिक कल्याण और चेतना के विकास के लिए रखी थी। लेकिन उनके जाने के बाद, संस्था के वर्तमान प्रबंधन से जुड़े कुछ लोगों ने इसका रुख जमीन-जायदाद के खेल की तरफ मोड़ दिया है।
* सुरेंद्र तिवारी और रजिस्ट्री का खेल: अपर कलेक्टर कोर्ट में सुनवाई के दौरान संस्था की ओर से सिहोरा निवासी मुख्तियार सुरेंद्र तिवारी उपस्थित हुए थे। संस्था और सुरेंद्र तिवारी की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने वर्ष 2007 में यह जमीन बकायदा रजिस्ट्री कराकर खरीदी थी, इसलिए वे ‘सद्भावी क्रेता’ हैं।
* ​नियमों की अनदेखी: मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता के स्पष्ट नियम हैं कि ‘शासकीय घास मद’ (चरनोई भूमि) या गरीबों को मिले ‘शासकीय पट्टे’ की अहस्तांतरणीय जमीन को बिना जिला कलेक्टर की पूर्व अनुमति के खरीदा या बेचा नहीं जा सकता। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि सुरेंद्र तिवारी और संस्था के प्रबंधकों ने बिना किसी अनुमति के इस विवादित जमीन की रजिस्ट्री कैसे करा ली?
* ​गरीब पट्टेदार का बयान: खसरा नंबर 164 जो कि ‘शंकरलाल डुमार’ के नाम पर शासकीय पट्टे के रूप में दर्ज था, उसके वारिस बसंत डुमार ने कोर्ट में उपस्थित होकर स्पष्ट बयान दिया कि उनके परिवार ने यह जमीन कभी संस्था या किसी अन्य को बेची ही नहीं।

राजस्व अमले की साठगांठ भी आई सामने
जांच में यह भी साफ हुआ है कि इस पूरे मामले को दबाने और संस्था का नाम रिकॉर्ड में बनाए रखने के लिए हल्का पटवारी ने भी नियमों का उल्लंघन किया। साल 2024 में तहसीलदार कोर्ट ने किसी अन्य खसरा नंबरों के सुधार का आदेश दिया था, लेकिन पटवारी ने उस आदेश की आड़ लेकर विवादित खसरा नंबर 143 और 164 के कॉलम नंबर 12 (कैफियत) में हेरफेर कर संस्था का नाम स्थायी रूप से दर्ज कर दिया था।

कोर्ट ने कहा- “अवैध है नामांतरण, जमीन सरकार की”
अपर कलेक्टर कोर्ट ने सभी दस्तावेजों और जांच रिपोर्टों का गहराई से अध्ययन करने के बाद माना कि यह पूरा नामांतरण पूरी तरह अवैध और बिना किसी सक्षम अधिकारी के आदेश के किया गया था। कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि:
* “खसरा नंबर 143 (रकबा 3.02 हे.) एवं खसरा नंबर 164 (रकबा 1.47 हे.) को स्प्रिचुअल रीजनरेशन मूवमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया के नाम से विलोपित कर पुनः शासकीय मद में दर्ज किया जाए और राजस्व रिकॉर्ड दुरुस्त किया जाए।”

बड़ा सवाल: सिर्फ जमीन की वापसी क्यों? दोषी पटवारी और संस्था के प्रबंधकों पर कब दर्ज होगी FIR?
अपर कलेक्टर कोर्ट ने जमीन तो वापस सरकारी खाते में दर्ज करा दी है, लेकिन क्षेत्र के जागरूक नागरिकों और ग्रामीणों का कहना है कि कार्रवाई सिर्फ जमीन वापस लेने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह मामला सीधे तौर पर सोची-समझी साजिश, जालसाजी और धोखाधड़ी का है।
स्थानीय जनता ने जिला प्रशासन और पुलिस अधीक्षक (SP) कटनी से मांग की है कि:
* संस्था के तत्कालीन और वर्तमान प्रबंधकों पर: जिन्होंने जीवित पट्टेदार के परिवार की मर्जी के बिना फर्जी तरीके से रजिस्ट्री कराई और करोड़ों की सरकारी जमीन को हथियाने का षड्यंत्र रचा।
* दोषी हल्का पटवारी पर: जिसने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए, साल 2024 में दूसरे कोर्ट आदेश की आड़ लेकर चालाकी से सरकारी खसरे के कॉलम-12 में हेरफेर किया।
ग्रामीणों का कहना है कि इन सभी रसूखदार चेहरों और भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी पर जालसाजी, कूटरचना और धोखाधड़ी (BNS की धारा 318/4 व अन्य धाराएं) के तहत तत्काल आपराधिक प्रकरण (FIR) दर्ज कर इन्हें जेल भेजा जाना चाहिए। जब तक ऐसे भू-माफियाओं और उनके मददगार शासकीय सेवकों पर दांडिक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक सरकारी संपत्तियों पर नजर गड़ाए बैठे लोगों के हौसले पस्त नहीं होंगे।

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