कटनी। सरकारी अनाज की बर्बादी के पीछे सिर्फ प्रशासनिक सुस्ती नहीं, बल्कि एक सुनियोजित भ्रष्टाचार का ‘सिंडिकेट’ काम कर रहा था। सूत्रों की मानें तो गोग्रीन वेयर हाउसेस प्राइवेट लिमिटेड और तत्कालीन अधिकारियों के बीच ऐसा ‘मधुर संबंध’ था कि नियम-कायदे सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए। जब अनाज खुले में सड़ रहा था, तब साहब लोग अपनी तिजोरियां भरने और आलीशान गाड़ियां-बंगले खड़ा करने में मशगूल थे।
भ्रष्टाचार की ‘मलाई’ और बेबस किसान
अधिकारियों के संरक्षण का ही नतीजा था कि ठेका कंपनी का आज तक ‘बाल भी बांका’ नहीं हुआ। मजे की बात यह है कि शासन को करोड़ों का चूना लगाने के बाद भी सिंडिकेट के सदस्य मालामाल होकर सुरक्षित बैठे हैं।
* बर्बादी का आंकड़ा: अन्नदाता के पसीने की कमाई का 7 करोड़ 29 लाख रुपये का धान सड़ गया।
* गेहूं का नुकसान: भंडारण के अभाव में 13 करोड़ 93 लाख 95 हजार रुपये का गेहूं बर्बाद हो गया।
* टालमटोल की राजनीति: हाई कोर्ट में मामला लंबित होने का बहाना बनाकर दोषियों को बचाने का खेल चल रहा है।
न अधिकारी नपे, न कंपनी पर नकेल
हैरानी की बात यह है कि रीठी, बहोरीबंद और मझगवां जैसे क्षेत्रों में साल 2021-22 से अनाज सड़ता रहा, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने आंखें मूंद लीं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि अधिकारियों की शह पर ही कंपनी ने परिवहन और उठाव में जानबूझकर देरी की। आज स्थिति यह है कि जिम्मेदार अफसर या तो रिटायर हो रहे हैं या मलाईदार पोस्टिंग लेकर ट्रांसफर हो चुके हैं, जबकि सरकारी खजाना और किसान दोनों खाली हाथ हैं।
आखिर क्यों नहीं पूरी हुई आज तक जांच?
कटनी के इस महाघोटाले में सबसे बड़ा सवाल जांच की कछुआ चाल पर खड़ा हो रहा है। सूत्रों का कहना है कि जांच को जानबूझकर अंतिम रूप नहीं दिया जा रहा है, ताकि फाइलें ठंडे बस्ते में पड़ी रहें और तत्कालीन भ्रष्ट अधिकारियों पर कोई आंच न आए।
* रिटायरमेंट का इंतजार: जांच में देरी का मुख्य उद्देश्य यह है कि दोषी अधिकारी अपने रिटायरमेंट या ट्रांसफर तक समय काट लें, जिससे बाद में उन पर कार्रवाई करना तकनीकी रूप से जटिल हो जाए।
* दोषी कंपनी को अभयदान: प्रशासन और गोग्रीन वेयर हाउसेस प्राइवेट लिमिटेड के बीच का तालमेल इतना गहरा है कि अरबों का अनाज सड़ने के बावजूद कंपनी पर आज तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
* सिंडिकेट का सुरक्षा कवच: अधिकारियों ने गाड़ी-बंगले और अकूत संपत्ति तो जमा कर ली, लेकिन जब जवाबदेही की बारी आई तो ‘सिंडिकेट’ ने जांच की दिशा को ही मोड़ दिया।
* अन्नदाता की बलि: आज तक न तो किसी बड़े अफसर पर गाज गिरी और न ही ठेका कंपनी का कुछ बिगड़ा; बलि चढ़ी तो सिर्फ किसानों की मेहनत, जो 7.29 करोड़ के धान और 13.93 करोड़ के गेहूं के रूप में मिट्टी में मिल गई।

- स्व. श्री विनोद कुमार बहरे
