परीक्षाओं की साख बचाना अब सबसे बड़ी चुनौती

✍️संजीव श्रीवास्तव
देश में उच्च शिक्षा और पेशेवर पाठ्यक्रमों में प्रवेश पाने के लिए आयोजित होने वाली राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएँ लाखों विद्यार्थियों के भविष्य का आधार होती हैं। इन परीक्षाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता ही शिक्षा व्यवस्था की असली ताकत मानी जाती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बार-बार सामने आ रही गड़बड़ियों ने इस भरोसे को कमजोर कर दिया है।
राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा एजेंसी का गठन इस उद्देश्य से किया गया था कि प्रवेश परीक्षाएँ पारदर्शी, तकनीकी रूप से सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से आयोजित हों। शुरुआत में इससे उम्मीदें भी काफी थीं, क्योंकि अलग-अलग संस्थानों की परीक्षाओं को एक समान प्रणाली में लाने का प्रयास किया गया। परंतु समय के साथ पेपर लीक, तकनीकी खामियाँ, परीक्षा केंद्रों की अव्यवस्था और परिणामों को लेकर विवाद लगातार सामने आते रहे हैं।
हालिया घटनाओं ने यह प्रश्न फिर खड़ा कर दिया है कि क्या हमारी परीक्षा प्रणाली इतनी मजबूत है कि करोड़ों युवाओं का भविष्य सुरक्षित रह सके। जब किसी परीक्षा पर संदेह पैदा होता है तो उसका असर केवल प्रशासनिक स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन छात्रों पर भी पड़ता है जिन्होंने वर्षों की मेहनत, आर्थिक संसाधन और मानसिक ऊर्जा लगाई होती है। परीक्षा रद्द होना या जांच लंबित रहना छात्रों के लिए केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानसिक तनाव और अनिश्चितता का दौर बन जाता है।
समस्या का दूसरा पक्ष प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा है। तकनीक के बढ़ते उपयोग के बावजूद यदि प्रश्नपत्र सुरक्षा, परीक्षा संचालन और निगरानी में बार-बार चूक हो रही है तो यह व्यवस्था की गंभीर कमजोरी को दर्शाता है। केवल जांच बैठाना या दोषियों पर कार्रवाई की घोषणा करना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता है कि परीक्षा प्रणाली को मूल स्तर से मजबूत किया जाए—प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर वितरण, डिजिटल सुरक्षा, केंद्र प्रबंधन और मूल्यांकन तक हर चरण की स्वतंत्र निगरानी हो।
यह भी विचार करना होगा कि एक ही एजेंसी पर अत्यधिक परीक्षाओं का बोझ तो नहीं डाल दिया गया है। यदि जिम्मेदारियाँ ज्यादा हैं तो संस्थागत ढांचे का विस्तार, विशेषज्ञ संसाधनों की नियुक्ति और विकेंद्रीकरण जैसे कदम उठाने होंगे। परीक्षा आयोजन को प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी के रूप में देखने की जरूरत है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी निर्णय के केंद्र में विद्यार्थी होने चाहिए। परीक्षा प्रणाली का उद्देश्य केवल परीक्षा कराना नहीं, बल्कि प्रतिभा को न्यायपूर्ण अवसर देना है। पारदर्शिता, समयबद्ध निर्णय और स्पष्ट संवाद से ही छात्रों का विश्वास वापस जीता जा सकता है।
आज आवश्यकता केवल सुधार की नहीं, बल्कि भरोसे की पुनर्स्थापना की है। क्योंकि जब परीक्षा व्यवस्था पर विश्वास डगमगाता है, तो केवल परिणाम नहीं, बल्कि पूरी पीढ़ी का मनोबल प्रभावित होता है। शिक्षा व्यवस्था की साख बचाना अब व्यवस्था और शासन—दोनों की साझा जिम्मेदारी बन चुकी है।

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