कटनी [आशीष सोनी] । शहर की प्यास बुझाने वाली माई नदी पर इन दिनों भू-माफिया का ‘मशीनी प्रहार’ जारी है। रबर फैक्ट्री के पीछे और तुलसी नगर के बीच के हिस्से को जिस तरह मिट्टी से पाटा जा रहा है, उसने प्रशासन की कार्यप्रणाली और शहर के भविष्य पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
मशीनों से मिटाया जा रहा वजूद
पिछले दो दिनों से इलाके में भारी मशीनें (JCB/पोकलेन) गरज रही हैं। स्थानीय निवासियों के अनुसार, नदी की धारा को मिट्टी से दबाया जा रहा है और किनारे लगे हरे-भरे पेड़ों को जमींदोज किया जा रहा है। यह सब कुछ किसी विकास कार्य के लिए नहीं, बल्कि नदी की बेशकीमती जमीन पर अवैध कब्जा करने की नीयत से किया जा रहा है।
सरकारी पैसे की बर्बादी: कल संवारा, आज उजाड़ रहे
हैरानी की बात यह है कि मात्र दो साल पहले ही नगर निगम ने इसी स्थान पर लाखों रुपये खर्च कर नदी का गहरीकरण कराया था।
* तब का लक्ष्य: जलस्तर बढ़ाना और जल संकट दूर करना।
* अब का सच: उसी गहरीकरण वाली जगह को मिट्टी डालकर समतल किया जा रहा है।
“जब प्रशासन ने खुद पैसा खर्च कर इसे गहरा किया था, तो अब इसे खत्म होते देख जिम्मेदार मौन क्यों हैं? क्या भू-माफिया को सरकारी तंत्र का संरक्षण प्राप्त है?” — संजीव कुमार स्थानीय नागरिक
खतरे में शहर: बाढ़ और सूखे की दोहरी मार
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि माई नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हुआ, तो इसके परिणाम भयावह होंगे:
जलभराव: तुलसी नगर और साईंपुरम जैसे इलाके पहले ही बारिश में डूब जाते हैं। नदी पाटने से बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।
* जल संकट: भू-जल स्तर (Groundwater level) तेजी से गिरेगा, जिससे आने वाली गर्मियों में शहर बूंद-बूंद को तरसेगा।
मुख्य सवाल जो प्रशासन से पूछे जाने चाहिए:
* क्या मशीनों से हो रहे इस अवैध काम की जानकारी जिला प्रशासन और नगर निगम को नहीं है?
* नदी की भूमि पर निजी कब्जे की कोशिश करने वालों पर FIR क्यों नहीं हुई?
* पर्यावरण को पहुंचाई जा रही इस क्षति की भरपाई कौन करेगा?
यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो कटनी की पहचान ‘माई नदी’ केवल सरकारी फाइलों और नक्शों तक ही सीमित रह जाएगी। अब गेंद प्रशासन के पाले में है।

- स्व. श्री विनोद कुमार बहरे
