मिट्टी, बिजली और मेहनत की लागत बढ़ी, लेकिन नहीं मिल रहा उचित दाम; चाइनीज और डिजाइनर दीयों से परंपरागत कारोबार पर संकट
✍️संजीव श्रीवास्तव
कटनी। दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही शहर के बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। दुकानें रंग-बिरंगी झालरों, इलेक्ट्रॉनिक लाइटों और आकर्षक डिजाइनर दीयों से सज गई हैं। बाजार में तरह-तरह के रेडीमेड दीये ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं, लेकिन इन चमकदार उत्पादों के बीच मिट्टी के पारंपरिक दीये बनाने वाले स्थानीय कुम्हारों की चिंता बढ़ती जा रही है। महंगी मिट्टी, बढ़ते बिजली बिल और रेडीमेड दीयों से मिल रही कड़ी प्रतिस्पर्धा ने उनके पुश्तैनी कारोबार के सामने आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है।
कटनी में कुम्हार परिवारों के लिए दीपावली का मौसम सालभर की कमाई का महत्वपूर्ण अवसर होता है। गणेश उत्सव के बाद से ही परिवार के सदस्य दीये बनाने की तैयारियों में जुट जाते हैं। महिलाएं मिट्टी तैयार करने और दीयों को सुखाने का काम संभालती हैं, वहीं पुरुष चाक पर मिट्टी को आकार देकर दीये बनाते हैं। बच्चे भी इस पारिवारिक काम में हाथ बंटाते हैं। कई दिनों की मेहनत के बाद तैयार होने वाले दीयों को बाजार में उचित कीमत नहीं मिल पा रही है।
महंगी मिट्टी ने बिगाड़ा लागत का गणित
कुम्हारों के सामने सबसे बड़ी समस्या कच्चे माल की बढ़ती कीमत है। पहले मिट्टी आसानी से और कम दाम पर उपलब्ध हो जाती थी, लेकिन अब मिट्टी खरीदने और उसे कार्यस्थल तक लाने में अच्छी-खासी रकम खर्च करनी पड़ती है। एक ट्रॉली मिट्टी के लिए करीब तीन हजार रुपये तक खर्च होने की स्थिति ने कारीगरों की चिंता बढ़ा दी है। इसके अलावा मिट्टी को तैयार करने, दीये बनाने, सुखाने और पकाने में भी समय, श्रम और संसाधन लगते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक चाक से बढ़ा उत्पादन, बिजली खर्च भी बढ़ा
पहले कुम्हार पारंपरिक हाथ से चलने वाले चाक पर दीये तैयार करते थे, लेकिन अब कई कारीगर इलेक्ट्रॉनिक चाक का इस्तेमाल करने लगे हैं। इससे उत्पादन की गति तो बढ़ी है, मगर बिजली का खर्च भी बढ़ गया है। मिट्टी, बिजली और ईंधन की बढ़ती लागत के बीच तैयार दीयों का कम दाम मिलना कुम्हारों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
20 रुपये दर्जन तक बिक रहे पारंपरिक दीये
बाजार में रेडीमेड और डिजाइनर दीयों की बढ़ती उपलब्धता ने स्थानीय कारीगरों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। आकर्षक रंगों और अलग-अलग बनावट वाले दीयों के सामने साधारण मिट्टी के दीयों की मांग प्रभावित हो रही है। स्थिति यह है कि पारंपरिक मिट्टी के दीये करीब 20 रुपये दर्जन तक बिकने की स्थिति में हैं। इतनी कम कीमत में लागत और मेहनत का उचित मूल्य निकालना भी मुश्किल हो रहा है।
त्योहार की चमक के बीच कुम्हार परिवारों की चिंता
दीपावली पर घर-घर दीप जलाने की परंपरा भारतीय संस्कृति की पहचान रही है। मिट्टी के दीये इसी परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं। इसके बावजूद बाजार में आधुनिक सजावटी उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण पारंपरिक कारीगरों को अपने उत्पाद बेचने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
स्थानीय कुम्हारों से दीये खरीदें, बचाएं पुश्तैनी कला
जरूरत है कि कटनी के नागरिक इस दीपावली स्थानीय कुम्हारों से मिट्टी के दीये खरीदकर उनका उत्साह बढ़ाएं। इससे न केवल छोटे कारीगरों और उनके परिवारों को आर्थिक संबल मिलेगा, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही माटी कला और हमारी सांस्कृतिक परंपरा भी सुरक्षित रहेगी। दीपावली की असली रोशनी तभी सार्थक होगी, जब घरों को रोशन करने वाले कुम्हारों के जीवन में भी खुशियों का उजाला पहुंचे।

- स्व. श्री विनोद कुमार बहरे
