45 वार्ड, 45 पार्षद… फिर भी अंतिम सफर लाचार! क्या कटनी के जनप्रतिनिधियों के लिए ‘शव वाहन’ कोई मुद्दा नहीं?

कटनी। शहर की जनता ने जिन 45 वार्डों से अपने-अपने प्रतिनिधियों को चुनकर नगर निगम की दहलीज तक पहुंचाया था, आज वही जनता खुद को ठगा सा महसूस कर रही है। करीब तीन लाख की आबादी, 350 करोड़ का भारी-भरकम बजट और 45-45 पार्षदों की लंबी-चौड़ी फौज… इसके बावजूद पूरे कटनी शहर के पास एक पार्थिव देह को सम्मानपूर्वक श्मशान तक ले जाने के लिए एक ‘शव वाहन’ तक नहीं है।
सब कुछ जानते हुए भी इन 45 जन-प्रतिनिधियों की खामोशी अब जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रही है। आखिर क्यों 45 वार्डों के पार्षदों में से किसी एक ने भी इस गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर निगम परिषद में आवाज नहीं उठाई?

वार्डों में वोट मांगने वाले, अंतिम सफर में क्यों मुंह मोड़ गए?
* कागजी भाषण और ज़मीनी हकीकत: चुनाव के वक्त हर गली, हर चौराहे पर विकास और जनसेवा का वादा करने वाले पार्षदों को क्या अपने-अपने वार्ड में किसी के गुजर जाने पर परिजनों की बेबसी नजर नहीं आती?

* 45 आवाजें, फिर भी सन्नाटा: अगर 45 में से 5 पार्षद भी एक सुर में परिषद की बैठक में ‘शव वाहन’ की मांग रख देते, तो शायद आज शहर के किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार को अपने परिजन की देह श्मशान ले जाने के लिए दर-दर न भटकना पड़ता।

* निजी गाड़ियों की लूट पर चुप्पी: निजी वाहन मालिकों द्वारा परिजनों से मनमाना किराया वसूला जाता है, लेकिन 45 पार्षदों में से किसी ने भी इस खुलेआम लूट के खिलाफ आवाज उठाने की जहमत नहीं उठाई।

निगम परिषद की बैठकें सिर्फ बजट बांटने के लिए?
नगर निगम की सामान्य सभा और बैठकों में बड़े-बड़े निर्माण कार्यों, चौराहों के सौंदर्यीकरण और करोड़ों के ठेकों पर तो घंटों बहस होती है। पार्षद अपने-अपने वार्डों के लिए बजट खींचने की होड़ में लग जाते हैं, लेकिन महज 15 लाख रुपये के एक शव वाहन के लिए किसी का दिल नहीं पसीजता।

जनता पूछ रही सवाल: क्या संवेदनाएं सिर्फ चुनाव तक थीं?
जब किसी घर का दीया बुझता है, तो दुख सिर्फ उस परिवार का नहीं, पूरे वार्ड का होता है। लेकिन जनप्रतिनिधियों की इस अनदेखी ने यह साबित कर दिया है कि उनके लिए जनता सिर्फ ‘वोट बैंक’ है।
कटनी की जनता अब अपने-अपने क्षेत्र के पार्षदों से जवाब मांग रही है। 350 करोड़ के बजट में 15 लाख का शव वाहन न होना सिर्फ अफसरों की नाकामी नहीं, बल्कि उन 45 पार्षदों की संवेदनहीनता का भी सबूत है जिन्हें जनता ने अपना नुमाइंदा चुनकर भेजा था। क्या अब भी पार्षद जागेगें या जनता के इस दर्द को यूं ही नजरअंदाज करते रहेंगे?

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