अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह सरकार का नीतिगत फैसला है और इसमें न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि सरकार को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की वास्तविक संख्या की जानकारी होना जरूरी है।
याचिका में मांग की गई थी कि आगामी जनगणना में जाति आधारित गणना को शामिल न किया जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि जातिगत जनगणना का दुरुपयोग हो सकता है और इससे सामाजिक विभाजन बढ़ने की आशंका है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि यह पूरी तरह नीतिगत विषय है, जिस पर निर्णय लेने का अधिकार सरकार के पास है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि सरकार द्वारा लिए गए नीति संबंधी निर्णयों में न्यायालय तभी हस्तक्षेप करता है जब उसमें संवैधानिक या कानूनी खामी दिखाई दे। इस मामले में ऐसा कोई आधार नजर नहीं आता। इसी के साथ अदालत ने जनहित याचिका को खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब आगामी जनगणना में जातिगत आंकड़ों को शामिल किए जाने का रास्ता साफ माना जा रहा है। केंद्र सरकार पहले ही संकेत दे चुकी है कि सामाजिक और आर्थिक योजनाओं को प्रभावी बनाने के लिए सटीक आंकड़ों की आवश्यकता है।

- स्व. श्री विनोद कुमार बहरे
