महाशिवरात्रि विशेष: कटनी के शिवालयों में उमड़ेगा आस्था का सैलाब, कहीं विराजे हैं ‘रूपनाथ’ तो कहीं ‘स्वयंभू’ भोलेनाथ

कटनी। महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर संस्कारधानी कटनी का कण-कण शिवमय होने जा रहा है। जिले के प्राचीन और सिद्ध शिवालयों में भगवान भोलेनाथ के दर्शन के लिए भक्तों की भारी भीड़ जुटने की तैयारी है। कटनी जिला न केवल अपनी खनिज संपदा के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहाँ स्थित शिव मंदिर अपनी प्राचीनता, चमत्कारिक इतिहास और अनोखी वास्तुकला के लिए पूरे प्रदेश में पहचाने जाते हैं।
आइए जानते हैं कटनी के उन प्रमुख धामों के बारे में, जहाँ महाशिवरात्रि पर दर्शन मात्र से कष्टों का निवारण होता है:

1. रूपनाथ धाम: जहाँ रुकी थी भोलेनाथ की बरात
बहोरीबंद स्थित रूपनाथ धाम आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। मान्यता है कि भगवान शिव जब माता पार्वती को व्याहने जा रहे थे, तब उनकी बरात यहाँ रुकी थी।
अनोखी विशेषता: पहाड़ी पर स्थित तीन प्राकृतिक कुंड—राम, सीता और लक्ष्मण कुंड—श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं। यहाँ साल भर पानी भरा रहता है।
इतिहास: यहाँ मौर्य सम्राट अशोक का शिलालेख भी मौजूद है, जो इसे आध्यात्मिक के साथ-साथ ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण बनाता है।

2. सिद्ध पीठ मधई मंदिर: 200 साल पुराना जागृत स्थान
कटनी शहर के हृदय स्थल में स्थित मधई मंदिर अपनी चमत्कारिक महिमा के लिए जाना जाता है।
चमत्कार: जनश्रुति है कि यहाँ एक समय में एक मृत व्यक्ति पुनर्जीवित हो गया था। घनघोर जंगल के बीच प्रकट हुए स्वयंभू शिवलिंग की महिमा ऐसी है कि महाशिवरात्रि पर यहाँ तिल रखने की जगह नहीं बचती।
विशेष आयोजन: यहाँ विधि-विधान से अभिषेक और पार्थिव शिवलिंग निर्माण की परंपरा दशकों से चली आ रही है। और प्रति वर्ष कैलाश पाठक भोले महाराज द्वारा शिव बारात भी निकाली जाती है।

3. कामकंदला (तपसी मठ): कलचुरी कालीन स्थापत्य का बेजोड़ नमूना
कलचुरी वंश के राजाओं द्वारा निर्मित यह स्थान अपनी भव्य नक्काशी के लिए विख्यात है।
वास्तुकला: यहाँ का शिव मंदिर ऊँची दीवारों और नक्काशीदार स्तंभों से सुसज्जित है। यद्यपि अब यहाँ केवल गर्भगृह और शक्तिपीठ शेष हैं, फिर भी भक्तों की आस्था यहाँ अटूट है। पुरातत्व विभाग (ASI) के अधीन होने के कारण इतिहास प्रेमी भी यहाँ बड़ी संख्या में पहुँचते हैं।

4. भरभरा और श्रीरामघाट: राम-शिव मिलन का प्रतीक
कटनी-जबलपुर मार्ग पर स्थित भरभरा वह पावन भूमि है जहाँ त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने स्वयं शिव पूजा की थी।
साक्ष्य: शिल्परा नदी के किनारे खुदाई में प्राप्त प्राचीन शिवलिंग और गणेश प्रतिमाएं इस स्थान की पौराणिकता को प्रमाणित करती हैं। महाशिवरात्रि पर यहाँ विशेष मेले का आयोजन होता है।

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